सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन के सोमवार को भगवान शिव का व्रत, जलाभिषेक और पूजा करने की परंपरा है। इस दिन अनेक भक्त श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं और शिवजी की पूजा के बाद सावन सोमवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण करते हैं।
यदि आप भी सावन सोमवार का व्रत रख रहे हैं या रखने की सोच रहे हैं, तो इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा को जानना उपयोगी रहेगा। पूजा के बाद कथा का पाठ या श्रवण करना कई धार्मिक परंपराओं में व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
आइए, अब सावन सोमवार से जुड़ी प्रचलित व्रत कथा पढ़ते हैं, जिसमें साहूकार की शिवभक्ति, उसके परिवार की कठिन परीक्षा और भगवान शिव की कृपा का वर्णन मिलता है।
सावन सोमवार की पौराणिक व्रत कथा
बहुत समय पहले की बात है, किसी समृद्ध नगर में एक धनी साहूकार रहता था। भगवान की कृपा से उसके पास धन-दौलत, मान-सम्मान और वैभव की कोई कमी नहीं थी। लेकिन इतने सुखों के बीच भी साहूकार और उसकी पत्नी के जीवन में एक गहरा दुख था—उनकी कोई संतान नहीं थी।
संतान न होने के कारण साहूकार की पत्नी अक्सर उदास रहती थी। साहूकार भी अंदर ही अंदर इस बात से टूट चुका था। संतान प्राप्ति की कामना से साहूकार ने हर सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखना शुरू किया। वह हर सोमवार को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ शिव मंदिर जाता, शिवलिंग पर जलाभिषेक करता और माता पार्वती व भोलेनाथ की दीप-धूप से पूजा करता था।
माता पार्वती का आग्रह और शिवजी का वरदान
साहूकार की निष्छल और निस्वार्थ भक्ति देखकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। एक दिन उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की—
“हे प्राणनाथ! यह साहूकार आपका परम भक्त है। यह हर सोमवार को नियमपूर्वक आपका पूजन करता है। फिर भी इसके जीवन में संतान न होने का इतना बड़ा दुख है। कृपया आप इसकी मनोकामना पूरी कीजिए और इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दीजिए।”
भगवान शिव ने माता पार्वती की बात सुनकर मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा—
“हे पार्वती! इस संसार में प्रत्येक प्राणी को उसके पूर्व जन्म और इस जन्म के कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। जो जैसा कर्म बीज बोता है, वैसा ही फल काटता है।”
लेकिन माता पार्वती ने साहूकार की भक्ति का वास्ता देकर पुनः आग्रह किया। तब महादेव ने पार्वती जी की बात रखते हुए कहा— “हे देवी! मैं इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दे देता हूँ, परंतु इसकी नियति में यह लिखा है कि इस बालक की आयु केवल 12 वर्ष ही होगी। 12 वर्ष पूर्ण होते ही यह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।”
साहूकार मंदिर के पास ही खड़ा यह सब सुन रहा था। उसे पुत्र मिलने की खुशी तो हुई, लेकिन बालक की अल्पायु की बात जानकर उसका दिल भारी हो गया। फिर भी उसने इसे ईश्वर की इच्छा माना और पहले की तरह भक्ति भाव से सोमवार का व्रत और शिव पूजन जारी रखा।
बालक का जन्म और काशी यात्रा
समय बीता और साहूकार की पत्नी ने एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी बालक को जन्म दिया। घर में खुशियाँ छा गईं, ढोल-नगाड़े बजे और दान-पुण्य किया गया। लेकिन साहूकार मन ही मन जानता था कि उसके बेटे के पास केवल 12 वर्ष का समय है। इसलिए उसने कभी भी अपनी खुशी को अहंकार में नहीं बदलने दिया और महादेव की पूजा में लीन रहा।
जब बालक 11 वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजने का निर्णय लिया। साहूकार ने बालक के मामा को बुलाया और उनसे कहा—
“आप इसे शिक्षा ग्रहण कराने के लिए काशी ले जाएं। रास्ते में आप जहाँ-जहाँ भी ठहरें, वहाँ-वहाँ धार्मिक यज्ञ कराएं, ब्राह्मणों को भरपेट भोजन कराएं और उन्हें यथाशक्ति वस्त्र व दान-दक्षिणा दें।”
मामा और भांजा साहूकार की आज्ञा लेकर काशी की ओर निकल पड़े। रास्ते में वे जहाँ भी रुकते, वहाँ यज्ञ का आयोजन करते, राहगीरों को पानी-भोजन कराते और ब्राह्मणों का आशीर्वाद लेते हुए आगे बढ़ते रहे।
राजकुमारी के साथ अनूठा विवाह
चलते-चलते मामा-भांजे एक ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ के राजा की पुत्री का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से राजकुमारी का विवाह तय हुआ था, वह एक आँख से काना था। काने राजकुमार के पिता को डर था कि अगर राजा को इस बात का पता चला तो विवाह टूट जाएगा।
जब उस काने राजकुमार के पिता ने साहूकार के सुंदर और तेजस्वी बालक को देखा, तो उसके मन में एक छल आया। उसने सोचा कि विवाह के मंडप में इस सुंदर बालक को दूल्हा बनाकर बिठा दिया जाए और विवाह संपन्न होने के बाद अपनी बहू को लेकर अपने राज्य लौट जाएँगे।
उसने साहूकार के बालक के मामा से बात की और बदले में बहुत सारा धन देने का लालच दिया। मामा और बालक ने परिस्थितियों को देखते हुए हाँ कर दी। साहूकार का बालक दूल्हा बना और राजकुमारी के साथ उसके फेरे हो गए।
विवाह संपन्न होने के बाद जब विदाई का समय आया, तो साहूकार के उस सत्यवादी बालक का ज़मीर जागा। उसने सोचा कि किसी निर्दोष कन्या के साथ ऐसा धोखा करना बहुत बड़ा पाप है। इसलिए उसने विदाई के समय राजकुमारी की चुनरी के पल्लू पर अपने हाथ से लिखा—
“हे राजकुमारी! तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें विदा किया जा रहा है, वह एक आँख से काना है। मैं तो अपनी शिक्षा पूरी करने काशी जा रहा हूँ।”
जब राजकुमारी ने अपनी चुनरी पर लिखे इन शब्दों को पढ़ा, तो उसने काने राजकुमार के साथ जाने से साफ मना कर दिया। उसने अपने पिता से कहा कि उसका असली पति तो काशी पढ़ने गया है। राजा ने स्थिति की गंभीरता को समझा और बारात को बिना दुल्हन के वापस लौटा दिया।
12वाँ वर्ष, मृत्यु और शिवजी का चमत्कार
इधर साहूकार का बेटा और उसके मामा काशी पहुँच गए। बालक दिन-रात मन लगाकर पढ़ाई करने लगा और मामा यज्ञ-अनुष्ठान करते रहे। देखते ही देखते वह समय आ गया जब बालक 12 वर्ष का पूरा होने वाला था।
जिस दिन बालक 12 वर्ष का हुआ, उसी दिन काशी में एक विशाल यज्ञ का आयोजन रखा गया था। बालक ने सुबह उठकर स्नान किया और यज्ञ की तैयारियों में मदद करने लगा। लेकिन दोपहर होते-होते अचानक उसकी तबियत बिगड़ने लगी। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा और उसे बहुत तेज चक्कर आने लगे।
उसने अपने मामा से कहा— “मामा जी, मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही है, मैं अंदर कमरे में जाकर थोड़ा विश्राम करना चाहता हूँ।”
बालक कमरे में गया और लेटते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए। वह 12 वर्ष की अल्पायु में काल के गाल में समा चुका था। जब मामा कमरे में गए और बालक को निश्चेत पाया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मामा सिर पकड़कर बिलख-बिलखकर रोने लगे। उनकी चीत्कार से पूरा वातावरण शोकाकुल हो गया।
भगवान शिव और माता पार्वती का आगमन
संयोगवश उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से भ्रमण करते हुए वहाँ से गुजर रहे थे। जब माता पार्वती ने किसी के फूट-फूटकर रोने की दर्दनाक आवाज सुनी, तो उनका हृदय कांप उठा।
उन्होंने शिवजी से कहा— “हे नाथ! कोई मनुष्य बहुत ही दुख में है। चलिए, चलकर देखते हैं कि उसे क्या कष्ट है।”
जब शिव-पार्वती उस स्थान पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मृत बालक वही साहूकार का पुत्र है। माता पार्वती ने जब उस बालक के निर्जीव शरीर को देखा, तो वे रो पड़ीं। उन्होंने शिवजी के चरण पकड़ लिए और बोलीं—
“हे त्रिलोकीनाथ! यह तो आपके उसी परम भक्त साहूकार का पुत्र है जो हर सोमवार को आपकी निश्छल भक्ति करता था। यदि आज यह बालक जीवित नहीं हुआ, तो संसार से लोगों का भक्ति पर से विश्वास उठ जाएगा। इसके माता-पिता इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे और प्राण त्याग देंगे। कृपया इस बालक को पुनर्जीवित कर दीजिए!”
भगवान शिव ने अपने भक्त की वर्षों की अटूट श्रद्धा और माता पार्वती के करुणामयी आग्रह को देखते हुए कहा— “हे देवी! मैं इस बालक को इसकी भक्ति और आपके स्नेह के कारण पुनर्जीवन प्रदान करता हूँ।”
भगवान शिव ने उस बालक पर अमृत की कुछ बूंदें छिड़कीं और ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण किया। देखते ही देखते बालक के शरीर में चेतना लौट आई। वह ऐसे उठकर बैठ गया जैसे गहरी नींद से सोकर उठा हो! मामा की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले और उन्होंने महादेव के चरणों में अपना शीश झुका दिया।
सुखद अंत और गृह वापसी
शिक्षा पूरी करने के बाद बालक अपने मामा के साथ काशी से अपने घर की ओर लौटा। रास्ते में वे पुनः उसी नगर से गुजरे जहाँ राजकुमारी रहती थी। राजा ने साहूकार के पुत्र को पहचान लिया। उन्होंने बड़े ही धूमधाम से दोनों का पुनर्मिलन कराया, अपनी बेटी को ढेर सारे उपहारों के साथ दामाद के साथ विदा किया।
जब साहूकार और उसकी पत्नी को खबर मिली कि उनका बेटा जीवित लौट रहा है और साथ में एक सुंदर बहू भी ला रहा है, तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। साहूकार ने पूरे नगर में मिठाई बँटवाई और विशाल भंडारे का आयोजन किया।
उस दिन के बाद से पूरा नगर सावन सोमवार के व्रत की महिमा को स्वीकार करने लगा। साहूकार का परिवार जीवन भर खुशहाली से रहा और अंत काल में शिवलोक को प्राप्त हुआ।
सावन सोमवार व्रत की सम्पूर्ण पूजा सामग्री
शिव पूजन से पहले इन सामग्रियों को एकत्र कर लें ताकि पूजा के समय कोई विघ्न न आए:
- पवित्र जल व तरल: जल, गंगाजल, और शुद्ध कच्चा दूध।
- शिवजी की प्रिय वनस्पतियाँ: बेलपत्र (खंडित न हो), धतूरा, भांग के पत्ते, शमी पत्र।
- पुष्प व सुगंध: सफेद पुष्प (जैसे मंदार/कनेर), चंदन (सफेद या लाल), भस्म।
- पूजा दीपक व धूप: अक्षत (अखंडित चावल), दीपक (गाय के घी का), धूप, कपूर।
- भोग सामग्री: नैवेद्य (मिठाई/पंचामृत), ऋतु फल (केला, सेब आदि)।
सावन सोमवार व्रत के मुख्य नियम
यदि आप सावन सोमवार का व्रत रख रहे हैं, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें ताकि आपकी पूजा सफल हो:
- ब्रह्मचर्य का पालन करें: व्रत के दिन मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
- क्रोध और झूठ से बचें: इस दिन किसी से कटु शब्द न बोलें, झूठ न बोलें और अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें।
- सात्विक भोजन करें: व्रत के दौरान लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा या भारी भोजन से दूर रहें। यदि फलाहार कर रहे हैं तो सात्विक आहार लें।
- शिव मंत्र का जाप करें: दिन भर मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का मन ही मन मानसिक जाप करते रहें।
- गरीबों और ज़रूरतमंदों को दान दें: पूजा पूरी होने के बाद किसी गरीब या ब्राह्मण को यथाशक्ति भोजन, अनाज या धन का दान ज़रूर करें।
सावन सोमवार की संक्षिप्त पूजन विधि
- प्रातःकाल स्नान: सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें।
- संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर भगवान शिव के सामने शांत मन से व्रत का संकल्प लें।
- जलाभिषेक: तांबे के लोटे से शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध और गंगाजल अर्पित करें।
- सामग्री अर्पण: इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद फूल और चंदन लगाएं।
- कथा का पाठ: धूप-दीप जलाकर ऊपर दी गई सावन सोमवार की कथा को ध्यानपूर्वक पढ़ें या सुनें।
- आरती: अंत में कपूर से शिवजी की आरती करें और भोग लगाएं।
भगवान शिव जी की आरती
जय शिव ओंकारा, हर जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ जय शिव…
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ जय शिव…
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ जय शिव…
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी करमालाधारी॥ जय शिव…
श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ जय शिव…
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ जय शिव…
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ जय शिव…
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे॥ जय शिव…
सावन सोमवार व्रत कथा कब पढ़नी चाहिए
सोमवार की प्रातःकाल या सायं काल की पूजा (जलाभिषेक और अर्पण) के तुरंत बाद व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना सबसे शुभ माना जाता है।
क्या बिना कथा सुने व्रत पूरा होता है
नहीं, धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा के बाद कथा सुनना या पढ़ना व्रत का महत्वपूर्ण और अनिवार्य भाग माना जाता है। बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है।
सावन सोमवार व्रत कौन रख सकता है
उत्तर: स्त्री, पुरुष, विवाहित, अविवाहित—कोई भी व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ यह व्रत रख सकता है।
क्या शाम को भी पूजा कर सकते हैं
उत्तर: जी हाँ! यदि सुबह किसी कारणवश समय न मिले या पूजा न हो पाए, तो शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास का समय) में भी श्रद्धा से पूजा और कथा की जा सकती है।
सावन सोमवार व्रत में क्या खाना चाहिए
उत्तर: इस व्रत में दिन में फलाहार (दूध, फल, मखाना, साबूदाना) किया जा सकता है। शाम की आरती और पूजा के बाद ही सात्विक या सेंधा नमक का भोजन ग्रहण करना चाहिए।
निष्कर्ष
सावन सोमवार की यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं। अगर हमारी नीयत साफ है और हम निस्वार्थ भाव से महादेव की शरण में जाते हैं, तो वे हमारी बड़ी से बड़ी विपत्ति को भी टाल देते हैं। इस सावन आप भी पूरे भक्ति भाव के साथ यह व्रत रखें और भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करें।
“हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय!”



















