हिंदू धर्म में कर्म, निर्माण और शिल्प को ईश्वर की उपासना का दर्जा दिया गया है। इसी परंपरा का सबसे बड़ा प्रतीक विश्वकर्मा जयंती है, जिसे आम बोलचाल में विश्वकर्मा पूजा कहा जाता है। सृष्टि के प्रथम वास्तुकार, शिल्पी और देवताओं के प्रधान अभियंता भगवान विश्वकर्मा को समर्पित यह पर्व भारत के हर कोने में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। कारखानों की विशाल मशीनों से लेकर एक छोटे कारीगर के साधारण औजारों तक, इस दिन हर उस साधन की पूजा की जाती है जिससे मनुष्य अपनी आजीविका चलाता है और समाज का निर्माण करता है।
विश्वकर्मा पूजा की मुख्य तारीख और शुभ मुहूर्त
विश्वकर्मा पूजा की मुख्य तारीख 17 सितंबर, दिन गुरुवार है। इस दिन कन्या संक्रांति का क्षण प्रातः 07:58 बजे रहेगा। कन्या संक्रांति लगते ही पुण्य काल आरंभ हो जाएगा, जो दोपहर 02:22 बजे तक रहेगा। पूजा के लिए सबसे उत्तम महापुण्य काल प्रातः 07:58 बजे से प्रातः 10:05 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त दोपहर में अभिजीत मुहूर्त 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक रहेगा। कारखानों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में प्रातः 07:58 बजे से 10:05 बजे के बीच महापुण्य काल में पूजा संपन्न करना सबसे शुभ और श्रेष्ठ माना गया है।
पौराणिक पृष्ठभूमि और भगवान विश्वकर्मा का स्वरूप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का मुख्य वास्तुविद माना गया है। धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। उन्होंने ही देवताओं के लिए दिव्य नगरों, अस्त्र-शस्त्रों और विशाल महलों का निर्माण किया था। रावण की भव्य सोने की लंका का मूल निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव और माता पार्वती के लिए किया था। इसके अलावा समुद्र के बीच भगवान श्रीकृष्ण की अभेद्य द्वारका नगरी और महाभारत काल की प्रसिद्ध राजधानियों हस्तिनापुर तथा इंद्रप्रस्थ के वास्तुकार भी भगवान विश्वकर्मा ही थे। देवताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रमुख दिव्य अस्त्र, जैसे भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, यमराज का कालदंड और कुबेर का पुष्पक विमान भी इन्हीं के द्वारा गढ़े गए थे।
भारत में विश्वकर्मा पूजा का व्यापक स्वरूप
भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व को अलग-अलग रंगों में लेकिन एक समान श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पूर्वी भारत के राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और असम में यह त्यौहार अत्यंत भव्य रूप में आयोजित होता है। यहाँ छोटे गैरेज से लेकर विशाल औद्योगिक संयंत्रों तक में बड़े-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं, भगवान विश्वकर्मा की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और कारीगर पूरी रात उत्सव मनाते हैं। कई शहरों में इस दिन आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में व्यापारी, इंजीनियर, वाहन चालक, निर्माण श्रमिक और तकनीशियन अपनी कार्यशालाओं, मशीनों, कंप्यूटरों और औजारों की विशेष अर्चना करते हैं। दक्षिण भारत में शिल्पकार और धातु कर्मी अपनी परंपराओं के अनुसार कन्या संक्रांति पर विशेष हवन और औजार पूजन संपन्न करते हैं।
पूजा सामग्री की संपूर्ण तैयारी
पूजा शुरू करने से पहले जरूरी सामग्री जुटाकर रख लेना चाहिए ताकि अनुष्ठान में कोई बाधा न आए। इसके लिए भगवान विश्वकर्मा की सुंदर प्रतिमा या तस्वीर, लकड़ी की एक साफ चौकी, उस पर बिछाने के लिए लाल या पीला नया वस्त्र, तांबे या मिट्टी का कलश, गंगाजल, नारियल और आम के पांच पत्ते आवश्यक हैं। पूजन सामग्री में रोली, सफेद व पीला चंदन, बिना टूटे अक्षत, अबीर, गुलाल, कलावा, जनेऊ, धूप, अगरबत्ती, कपूर और गाय के शुद्ध घी का दीपक शामिल करें। इसके साथ ही ताजे सुगंधित फूल, गेंदे की माला, पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, छोटी इलायची, मौसमी फल, पंचामृत और भोग के लिए बेसन के लड्डू या पेड़े की व्यवस्था करें। साथ ही मशीनों और औजारों पर बांधने के लिए पर्याप्त रक्षा सूत्र भी रखें।
चरणबद्ध संपूर्ण पूजा विधि
पूजा के दिन सबसे पहले स्वच्छता और शुद्धिकरण का ध्यान रखा जाता है। पूजा से एक दिन पहले ही कार्यस्थल, मशीनों, वाहनों और औजारों की अच्छी तरह साफ-सफाई और मरम्मत कर लेनी चाहिए। पूजा के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। इसके बाद कार्यस्थल और पूजा के स्थान पर गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। ईशान कोण या पूर्व दिशा में लकड़ी की चौकी रखकर उस पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं और भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। पास में ही जल से भरा कलश स्थापित करें, जिसमें आम के पत्ते, सुपारी और सिक्का डालकर ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें।
इसके बाद घी का दीपक और धूपबत्ती जलाकर हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पूजा का संकल्प लें कि आप व्यापार की उन्नति, कार्यकुशलता और सुरक्षा के लिए यह आराधना कर रहे हैं। सर्वप्रथम विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का ध्यान कर उन्हें सिंदूर, दूर्वा और मोदक अर्पित करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए वैदिक मंत्रों का श्रद्धा से उच्चारण करें। भगवान को रोली और चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत अर्पित करें, फूलों की माला पहनाएं तथा जनेऊ व कलावा समर्पित करें।
इसके बाद अपने कार्य से जुड़े प्रमुख औजारों, मशीनों, कंप्यूटरों और वाहनों का पूजन किया जाता है। सभी मुख्य उपकरणों पर रोली और चंदन से स्वास्तिक का शुभ चिन्ह बनाएं, उन पर अक्षत और फूल चढ़ाएं तथा मौली यानी रक्षा सूत्र बांधें। ईश्वर से प्रार्थना करें कि ये उपकरण बिना किसी खराबी या दुर्घटना के सुचारु रूप से चलते रहें। अंत में भगवान को फल, मिठाई और पंचामृत का भोग लगाएं, पान का बीड़ा अर्पित करें और कपूर या घी के दीपक से श्रद्धापूर्वक आरती उतारें। पूजा संपन्न होने के बाद उपस्थित सभी कर्मचारियों, परिजनों और सहयोगियों में प्रसाद बांटें।
भगवान विश्वकर्मा की आरती

ॐ जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा। सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक स्तुति धर्मा॥ आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया। जीव मात्र का जग में, सब साधन किया॥ ऋषि-मुनि तप करते, ध्यान लगावत मन। शिल्प कला का दीपक, तुमने किया चेतन॥ पुष्पक विमान बनाया, अति सुंदर शोभा। त्रिभुवन में प्रभु तेरा, रूप अजब सोहा॥ जो जन ध्यान लगावे, फल मनवांछित पावे। कष्ट मिटे सब उसके, सुख-संपत्ति आवे॥ ॐ जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा।
पर्व से जुड़े जरूरी नियम और सावधानियां
विश्वकर्मा पूजा के दिन कुछ विशेष मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। इस दिन सबसे प्रमुख नियम यह है कि अपने औजारों, मशीनों और व्यावसायिक साधनों से कोई काम नहीं लिया जाता। यह औजारों को विश्राम देने और उनके प्रति आदर प्रकट करने का दिन होता है। घर और कार्यस्थल पर पूरी तरह सात्विक वातावरण बनाए रखना चाहिए तथा किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन या मदिरा से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए। इसके अलावा किसी भी औजार या यंत्र का अनादर न करें, उन्हें पैर से न छुएं और न ही जमीन पर पटकें। यह दिन श्रम और कारीगरों का सम्मान करने का पर्व है, इसलिए अपने कर्मचारियों, चालकों और सहायकों को उपहार, बोनस या मिठाई देकर उनका आदर अवश्य करें।
विश्वकर्मा पूजा का दार्शनिक और सामाजिक संदेश
विश्वकर्मा पूजा केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा संदेश देता है। यह पर्व सिखाता है कि हर वह औजार, मशीन और तकनीक जो मनुष्य को आजीविका देती है और समाज को आगे बढ़ाती है, वह वंदनीय है। चाहे कोई विशाल उद्योगपति हो, सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो, शिल्पकार हो या सामान्य मैकेनिक, यह पर्व हर निर्माता और उसके साधनों के बीच के आदर भाव को प्रकट करता है। जब हम अपने कार्य, कर्मक्षेत्र और काम के साधनों को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं, तो कार्य में एकाग्रता बढ़ती है, गलतियां कम होती हैं और जीवन में स्वाभाविक रूप से सुख-समृद्धि का वास होता है।






