जानें अपने पूजा घर को सकारात्मक ऊर्जा और दिव्यता से भरने का सबसे सरल और सटीक तरीका।
जब भी हम अपने नए घर में प्रवेश करते हैं या फिर पुराने घर के कोने-कोने को नए सिरे से सजाने की सोचते हैं, तो सबसे पहला और सबसे पवित्र ख्याल जो हमारे मन में आता है, वह होता है हमारे घर का मंदिर। सोचकर देखिए, जब सुबह-सुबह उठते ही घर में मीठी-मीठी घंटियों की आवाज गूंजती है और कपूर की भीनी-भीनी महक पूरे कमरे में फैल जाती है, तो दिल को कितना सुकून मिलता है। ऐसा लगता है मानो भगवान खुद हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। लेकिन कई बार हम अनजाने में मंदिर की स्थापना ऐसी जगह पर कर देते हैं जहाँ वास्तु के नियम टूट जाते हैं, और फिर लाख पूजा-पाठ करने के बाद भी वो मानसिक शांति या बरकत घर में टिक नहीं पाती।
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि भाई, मंदिर घर में कहाँ रखें ताकि सुख-शांति बनी रहे और किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का साया भी घर पर न पड़े। यह कोई रटी-रटाई बात नहीं है, बल्कि हमारे बुजुर्गों और प्राचीन वास्तु विज्ञान का निचोड़ है जिसे अगर हम अपने जीवन में उतार लें, तो सचमुच घर का माहौल बदल जाता है। आइए आज बिल्कुल खुलकर, बिना किसी जटिलता के और एकदम अपनेपन के साथ समझते हैं कि घर में मंदिर की सही दिशा कौन सी होनी चाहिए, रंगों का चुनाव कैसा हो और वो कौन सी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका हमें विशेष ध्यान रखना चाहिए।
मंदिर के लिए सबसे सही और ऊर्जावान दिशा

जब बात दिशा की आती है, तो सबसे उत्तम और पहली पसंद हमेशा ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व (North-East) दिशा को माना जाता है। अब आप सोचेंगे कि भाई आखिर इसी दिशा को क्यों चुना जाता है? इसके पीछे बहुत ही गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण है। उत्तर-पूर्व दिशा को देवताओं की दिशा कहा गया है, क्योंकि इस तरफ से सूर्य की पहली और सबसे सकारात्मक किरणें हमारे घर में प्रवेश करती हैं। सुबह की ताजी धूप और ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत यही कोना होता है। जब आप इस दिशा में अपना मुख करके बैठते हैं, तो आपका पूरा शरीर और मन एक अलग ही ऊर्जा से भर जाता है।
किसी वजह से आपके घर में उत्तर-पूर्व दिशा में मंदिर रखना संभव न हो पा रहा हो, तो घबराने की कोई बात नहीं है। आप पूर्व दिशा (East) या फिर उत्तर दिशा (North) का चुनाव भी कर सकते हैं। ये दोनों दिशाएं भी उतनी ही शुभ और फलदायी मानी गई हैं। बस एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि मंदिर कभी भी दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम (South-West) दिशा में भूलकर भी न बनाएं। दक्षिण दिशा को यम और नकारात्मक ऊर्जा की दिशा माना गया है, इसलिए इस तरफ भगवान का स्थान रखने से घर में हमेशा मानसिक तनाव और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अपने घर का नक्शा उठाइए, उस कोने को देखिए जहाँ शांति महसूस होती हो और बस वहीं अपने आराध्य का प्यारा सा आशियाना सजा दीजिए।
मंदिर हमेशा ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहाँ बैठकर पूजा करते समय आपका चेहरा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो, क्योंकि यह स्थिति एकाग्रता और सकारात्मकता को सीधा बढ़ावा देती है।
दीवारों और पृष्ठभूमि के लिए सही रंगों का चुनाव
रंगों का हमारे जीवन पर, हमारी सोच पर और हमारे घर के वातावरण पर बहुत गहरा असर पड़ता है। जब हम मंदिर की बात करते हैं, तो वहाँ की सजावट भड़कीली या बहुत ज्यादा चमकदार नहीं होनी चाहिए। मंदिर एक ऐसा स्थान है जहाँ आँखें बंद करते ही मन शांत हो जाना चाहिए। इसलिए हमेशा हल्के, सात्विक और प्राकृतिक रंगों का ही चुनाव करना चाहिए। सफेद रंग, हल्का पीला (Cream), हल्का गुलाबी या फिर आसमानी रंग मंदिर के लिए सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ये रंग न सिर्फ आंखों को ठंडक देते हैं, बल्कि कमरे में पवित्रता और स्वच्छता का अहसास भी कराते हैं।
आजकल लोग बहुत ज्यादा आधुनिक दिखने के चक्कर में मंदिर की दीवारों पर गहरे काले, लाल या डार्क ग्रे रंग करवा देते हैं जो कि वास्तु के अनुसार बिल्कुल भी उचित नहीं माना जाता है। भगवान का स्थान हमेशा सादगी और शीतलता का प्रतीक होना चाहिए। लकड़ी के रंग का पॉलिश या नेचुरल वुडन फिनिश भी मंदिर के पीछे की दीवार पर बहुत ही शानदार और क्लासी लुक देता है। जब आप सुबह-सुबह दीपक जलाते हैं और दीवारों पर हल्के रंगों की वजह से एक शांत रोशनी बिखरती है, तो पूरा घर महक उठता है। इसलिए रंगों का चयन करते समय इस बात का खास ख्याल रखें कि वह मन को भटकाए नहीं बल्कि मंदिर की दिव्यता को और ज्यादा बढ़ा दे।
मंदिर की सजावट और साफ-सफाई के व्यावहारिक नियम
मंदिर की सही दिशा और रंग चुन लेने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि उसकी साफ-सफाई और रखरखाव कैसे किया जाए। देखिए, भगवान भी वहीं वास करते हैं जहाँ साफ-सफाई और पवित्रता का वास होता है। अगर आपके घर का मंदिर सुंदर भी है और सही दिशा में भी रखा है, लेकिन वहाँ धूल जमी है या पूजा के पुराने फूल वैसे ही पड़े हैं, तो वह सकारात्मक ऊर्जा कभी टिक नहीं सकती। इसलिए मंदिर की रोज की हल्की सफाई और हफ्ते में एक बार गहरी सफाई का नियम बना लीजिए। दीपक और अगरबत्ती का स्थान ऐसा होना चाहिए जिससे दीवारें काली न हों और हवा का आवागमन बना रहे।
एक बात और, मंदिर के अंदर कभी भी बहुत भारी मूर्तियां या बहुत बड़ी तस्वीरें नहीं रखनी चाहिए। हमेशा छोटी और मन को मोहने वाली मूर्तियां ही स्थापित करें जिन्हें संभालना आसान हो। इसके अलावा, मंदिर के पर्दे का रंग भी हल्का पीला, सफेद या केसरिया होना चाहिए। जब आप इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना शुरू करेंगे, तो आपको खुद महसूस होगा कि घर की हवा में एक अजीब सी पॉजिटिविटी घुल गई है। घर के बच्चे हों या बड़े, जब वे सुबह-सुबह उस साफ-सुथरे और पवित्र कोने के सामने हाथ जोड़कर खड़े होंगे, तो उनके दिन की शुरुआत ही एक बेहतरीन और ऊर्जावान तरीके से होगी।
गलतियां जो अक्सर लोग अनजाने में कर बैठते हैं

कई बार हम जोश में आकर कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। सबसे पहली गलती जो लोग अक्सर करते हैं, वह यह है कि वे मंदिर को अपने बेडरूम में या सीढ़ियों के ठीक नीचे बना लेते हैं। अगर आपका घर छोटा है और बेडरूम में ही मंदिर रखना मजबूरी है, तो कम से कम रात के समय या जब जरूरत न हो, उसपर एक साफ पर्दा जरूर डाल कर रखें। लेकिन कभी भी शौचालय (Toilet) के ठीक बगल वाली दीवार या उसके ऊपर-नीचे मंदिर नहीं होना चाहिए। यह ऊर्जा के प्रवाह को पूरी तरह से ब्लॉक कर देता है और घर में बरकत आनी बंद हो जाती है।
दूसरी सबसे बड़ी भूल लोग यह करते हैं कि खंडित मूर्तियां या मुरझाए हुए फूल महीनों तक मंदिर में रखे रहते हैं। ऐसा बिल्कुल न करें। अगर कोई मूर्ति थोड़ी सी भी खंडित हो जाए, तो उसे किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए या किसी पेड़ के नीचे रख देना चाहिए। मंदिर में कभी भी बहुत ज्यादा भीड़ या कबाड़ न इकट्ठा होने दें। पूजा की किताबें, कपूर, माचिस और दीपक को रखने के लिए एक अलग छोटी सी दराज बना लें ताकि मुख्य स्थान हमेशा साफ-सुथरा और खुला-खुला लगे। इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर आप अपने घर के मंदिर को असली मायनों में ऊर्जा का एक पावन केंद्र बना सकते हैं।


