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नवरात्रि कलश स्थापना में सावधानियां और पूजा सामग्री

नवरात्रि में कलश स्थापना करते समय न करें ये 8 बड़ी गलतियां (जरूरी बातें)

By Deepak Kumar
Published: सोमवार, 28 सितंबर 2026 at 4:43 PM

नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में बहुत ही श्रद्धा, उल्लास और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना (कलश स्थापना) का विशेष विधान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना देवी शक्ति के आह्वान का प्रतीक मानी जाती है और इसे घर में सुख-शांति व सकारात्मक वातावरण के लिए शुभ माना जाता है।

लेकिन, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धतियों में कलश स्थापना के नियमों में कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए कलश स्थापना करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। आज के इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कलश स्थापना करते समय कौन सी 8 गलतियों से बचना चाहिए, ताकि आपकी पूजा श्रद्धा और विधि के साथ संपन्न हो सके।

घटस्थापना शुभ मुहूर्त (शारदीय नवरात्रि)

विवरणसमय / स्थिति
प्रतिपदा तिथि आरंभपंचांग के अनुसार
सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त (प्रातःकाल)स्थानीय पंचांग में दिए गए शुभ समय के अनुसार
अभिजीत मुहूर्त (दोपहर)स्थानीय पंचांग के अनुसार, यदि उपलब्ध हो

नोट: घटस्थापना का सही मुहूर्त स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए अपने शहर के अनुसार मान्य पंचांग में दिए गए समय को प्राथमिकता दें।

🛒 कलश स्थापना आवश्यक सामग्री चेकलिस्ट (Samagri Checklist)

घटस्थापना शुरू करने से पहले इन सभी सामग्रियों को अपने पास एकत्रित कर लें ताकि बीच में पूजा बाधित न हो:

  • शुद्ध मिट्टी का बर्तन या चौड़ा पात्र (जवारे बोने के लिए)
  • साफ बालू और उपजाऊ मिट्टी
  • शुद्ध जौ (यव)
  • तांबे, पीतल या मिट्टी का शुद्ध कलश (अखंडित)
  • पवित्र गंगाजल और ताजा जल
  • सुपारी, सिक्का, अक्षत (साबुत चावल), दुर्वा घास और हल्दी की गांठ
  • 5 या 7 ताजे, हरे और स्वस्थ आम या अशोक के पत्ते
  • जटा वाला सूखा नारियल और लाल कलावा (मौली)
  • मां को अर्पित करने के लिए लाल चुनरी
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Image Credit: Gemini

1. गलत दिशा या स्थान का चुनाव करना

कलश स्थापना के लिए सही दिशा और स्थान का चयन करना महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक और वास्तु संबंधी मान्यताओं में पूजा के लिए घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा को शुभ माना जाता है। यदि ईशान कोण में जगह न मिल पाए, तो उत्तर या पूर्व दिशा में भी पूजा स्थल बनाया जा सकता है। दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा में कलश रखने से संबंधित अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं, इसलिए अपने परिवार की परंपरा या पूजा-पद्धति को प्राथमिकता देना उचित है। इसके अलावा अंधेरे स्थान, सीढ़ियों के नीचे या शौचालय के बिल्कुल पास कलश रखने से बचना चाहिए। पूजा का यह स्थान साफ-सुथरा, शांत और व्यवस्थित होना चाहिए।

2. अशुद्ध और गंदे स्थान पर कलश रखना

पूजा का स्थान हमेशा साफ और पवित्र रखने की परंपरा है, लेकिन कई बार लोग जल्दबाजी में ऐसी जगह पर पूजा की चौकी रख देते हैं जहां साफ-सफाई ठीक से नहीं होती। पूजा के लिए ऐसी जगह चुनने से बचें जहां बार-बार लोगों के पैर पड़ते हों या धूल-मिट्टी रहती हो। सही तरीका यह है कि पूजा स्थल पर सबसे पहले एक साफ लकड़ी की चौकी रखें। उस पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ सूती या रेशमी वस्त्र बिछाएं और फिर गंगाजल छिड़ककर पूजा स्थल को पवित्र करें। इसके बाद मिट्टी के बर्तन में बालू और साफ मिट्टी मिलाकर जवारे बोएं और उसके ऊपर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। इससे पूजा स्थल व्यवस्थित और स्वच्छ बना रहता है।

3. खंडित या गंदे कलश का प्रयोग करना

कलश को कई धार्मिक परंपराओं में शुभता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसकी शुद्धता और अखंडता का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा में टूटा हुआ, चटका हुआ या गंदा कलश इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। पारंपरिक रूप से तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश का उपयोग किया जाता है। हालांकि पूजा-पद्धति और परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें अंतर हो सकता है। यदि आप मिट्टी का कलश ले रहे हैं, तो यह अच्छी तरह जांच लें कि वह कहीं से भी खंडित न हो। कलश को साफ पानी से अच्छी तरह साफ करके ही उपयोग में लाना चाहिए।

4. कलश के जल में अशुद्धता या गलत सामग्री डालना

कलश के अंदर भरा जाने वाला जल पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसकी स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। कलश में हमेशा साफ और ताजा जल भरें तथा परंपरा के अनुसार उसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाया जा सकता है। कई पूजा-पद्धतियों में कलश के जल में सुपारी, साबुत चावल, सिक्का, दुर्वा और हल्दी की गांठ जैसी सामग्री रखने की परंपरा है। इन सामग्रियों का उपयोग अलग-अलग परंपराओं में अलग तरीके से किया जा सकता है। इसलिए अपने परिवार या पुरोहित द्वारा बताई गई पूजा-विधि को प्राथमिकता देना उचित है।

5. आम या अशोक के पत्तों और जटा वाले नारियल को गलत तरीके से रखना

कलश के मुख पर रखे जाने वाले आम या अशोक के पत्ते और उसके ऊपर रखा नारियल घटस्थापना का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। पूजा में सूखे, पीले, कटे-फटे या कीड़े लगे हुए पत्तों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। पारंपरिक विधि में कलश के मुख पर 5 या 7 ताजे और स्वस्थ पत्ते रखने की परंपरा है। इसके बाद जटा वाला नारियल लेकर उसे लाल कलावा से बांधकर कलश के ऊपर रखा जाता है। नारियल रखने की दिशा और विधि अलग-अलग पूजा-पद्धतियों में अलग हो सकती है, इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार ही इसे स्थापित करें।

6. जवारे (प्रतिपदा के जौ) बोने में लापरवाही बरतना

नवरात्रि में जवारे बोने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है और इन्हें हरियाली, उर्वरता तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जवारे बोते समय बहुत अधिक मात्रा में बीज एक ही जगह पर नहीं डालने चाहिए और मिट्टी को पूरी तरह सूखने भी नहीं देना चाहिए। इसके अलावा बासी या खराब हो चुके अनाज का उपयोग करने से बचना चाहिए। साफ और उपजाऊ मिट्टी में अच्छे जौ को समान रूप से फैलाना चाहिए और मिट्टी में हल्की नमी बनाए रखनी चाहिए ताकि वे समय पर अंकुरित हो सकें। जवारे के रंग और वृद्धि को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं, इसलिए इन्हें निश्चित भविष्यवाणी का आधार नहीं माना जाना चाहिए।

7. नियमों और शुभ मुहूर्त की अनदेखी करना

घटस्थापना के लिए शुभ समय का ध्यान रखना कई धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है। सामान्य रूप से प्रतिपदा तिथि में पंचांग द्वारा बताए गए घटस्थापना मुहूर्त को प्राथमिकता दी जाती है। राहुकाल या अन्य अशुभ समय को लेकर भी अलग-अलग परंपराओं में मान्यताएं मिलती हैं। यदि किसी कारण से निर्धारित समय में स्थापना न हो पाए, तो बिना अनुमान लगाए स्थानीय पंचांग या योग्य पुरोहित से उचित समय की जानकारी लेना बेहतर है। घटस्थापना का सही समय स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए किसी दूसरे शहर के मुहूर्त को अपने स्थान पर सीधे लागू न करें।

8. कलश स्थापना के बाद साफ-सफाई और नियमों का पालन न करना

कलश स्थापना के बाद पूजा स्थल की स्वच्छता और सात्विक वातावरण बनाए रखना धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। कलश को बार-बार हिलाने या अनावश्यक रूप से स्थान बदलने से बचें। घर में नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन और संयमित दिनचर्या रखने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। रोज सुबह-शाम अपनी पूजा-पद्धति के अनुसार कलश की पूजा करें, दीपक जलाएं और माता को भोग लगाएं। नौ दिनों तक पूजा स्थल को साफ रखें और नवरात्रि की समाप्ति के बाद कलश को सम्मानपूर्वक हटाएं।

🙏 कलश और जवारे विसर्जन के नियम

नवरात्रि के समापन (अष्टमी, नवमी या दशमी तिथि) के बाद कलश और जवारे का विसर्जन या उपयोग अपनी पारिवारिक परंपरा और पूजा-विधि के अनुसार करना चाहिए:

  • कलश का जल: कलश के जल का उपयोग परंपरा के अनुसार घर में छिड़काव के लिए किया जा सकता है। बचा हुआ जल किसी स्वच्छ स्थान या पौधे में डाल सकते हैं।
  • कलश के अंदर के सिक्के और सुपारी: कलश में रखी सुपारी और सिक्का आप अपने पूजा घर में सुरक्षित रख सकते हैं या अपनी परंपरा के अनुसार उपयोग कर सकते हैं।
  • नारियल और जवारे: जवारे को श्रद्धा के साथ घर के सदस्यों में बांटने की परंपरा कई स्थानों पर है। बाकी जवारे और पूजा सामग्री को अपनी स्थानीय या पारिवारिक परंपरा के अनुसार विसर्जित करें। नदी या तालाब में ऐसी सामग्री डालने से बचें जिससे जल प्रदूषण हो।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. क्या नवरात्रि के बीच में कलश या जवारे को अपनी जगह से हटाया जा सकता है?

उत्तर: आम तौर पर कलश स्थापना के बाद उसे बार-बार स्थान बदलने से बचने की परंपरा है। यदि किसी विशेष परिस्थिति में स्थान बदलना जरूरी हो, तो अपनी पूजा-पद्धति के अनुसार किसी पुरोहित या परिवार के जानकार व्यक्ति से सलाह लेना उचित है।

Q2. यदि कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह छूट जाए तो क्या करें?

उत्तर: यदि निर्धारित घटस्थापना मुहूर्त निकल गया है, तो अपने शहर के पंचांग में उपलब्ध अन्य शुभ समय की जानकारी लें। बिना जांचे किसी दूसरे स्थान का मुहूर्त लागू न करें।

Q3. क्या जवारे का पीला होना अशुभ होता है?

उत्तर: जवारे का रंग और वृद्धि कई प्राकृतिक कारणों से प्रभावित हो सकती है। धार्मिक परंपराओं में इनके बढ़ने और रंग को लेकर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं, लेकिन इसे निश्चित रूप से शुभ या अशुभ भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए। जवारे में जरूरत के अनुसार हल्की नमी बनाए रखें।

निष्कर्ष

नवरात्रि का यह पावन पर्व हमारी आस्था, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का बड़ा प्रतीक है। कलश स्थापना एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है, जिसे कई परिवार देवी शक्ति के आह्वान और शुभता के प्रतीक के रूप में निभाते हैं। यदि आप ऊपर बताई गई इन 8 बातों का ध्यान रखते हैं और अपनी पारिवारिक पूजा-पद्धति के अनुसार विधि का पालन करते हैं, तो नवरात्रि की पूजा श्रद्धा और व्यवस्थित तरीके से संपन्न की जा सकती है। माता रानी आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखें। जय माता दी!

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं पारंपरिक मान्यताओं, धार्मिक परंपराओं और ज्योतिषीय जानकारियों पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और पूजा-पद्धतियों में नियम अलग हो सकते हैं। हमारा उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी उपलब्ध कराना है। किसी विशेष पूजा-विधि या धार्मिक अनुष्ठान को करने से पहले अपने पारिवारिक पुरोहित या किसी योग्य विद्वान की सलाह लेना उचित है।

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