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भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत उठाते हुए और सामने सजा अन्नकूट भोग

गोवर्धन पूजा 2026: जानिए कथा, महत्व, अन्नकूट और पूजा विधि

By Deepak Kumar
Published: शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 at 5:24 PM

हमारे सनातन धर्म में हर त्योहार के पीछे कोई न कोई ऐसा गहरा संदेश छिपा होता है, जो सीधे तौर पर हमारे जीवन, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व ऐसा ही एक प्रेरणादायक त्योहार है। इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है।

साल 2026 में भारत के अधिकांश क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा 10 नवंबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों और उनके पशुओं की रक्षा करने की पौराणिक कथा से जुड़ा है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की जाती है। साथ ही, घरों और मंदिरों में तरह-तरह के पकवान बनाकर भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति, पर्यावरण, पशुधन और अन्न के महत्व को समझने की प्रेरणा भी देता है। आइए जानते हैं गोवर्धन पूजा का पौराणिक इतिहास, आध्यात्मिक महत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और घर पर पूजा करने की सरल विधि।

1. गोवर्धन पूजा 2026 कब है? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। सामान्यतः यह दीपावली के अगले दिन पड़ती है। साल 2026 में प्रतिपदा तिथि 9 नवंबर को दोपहर से शुरू होकर 10 नवंबर को दोपहर तक रहेगी।

विवरणजानकारी
गोवर्धन पूजा10 नवंबर 2026, मंगलवार
तिथिकार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ9 नवंबर, दोपहर 12:31 बजे
प्रतिपदा तिथि समाप्त10 नवंबर, दोपहर 2:00 बजे
पटना में प्रातःकालीन पूजा मुहूर्तसुबह 6:03 से 8:15 बजे तक
दिल्ली में प्रातःकालीन पूजा मुहूर्तसुबह 6:40 से 8:50 बजे तक
प्रमुख उत्सवगोवर्धन पूजा और अन्नकूट

तारीख से जुड़ी जरूरी जानकारी: भारत के कई प्रमुख शहरों में उदयातिथि और स्थानीय पंचांग के अनुसार गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को बताई गई है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में स्थानीय पूजा-परंपरा और मुहूर्त के आधार पर 9 नवंबर को भी आयोजन हो सकता है। इसलिए पूजा करने से पहले अपने शहर के पंचांग या स्थानीय मंदिर से तिथि और मुहूर्त की पुष्टि अवश्य कर लें।

2. गोवर्धन पूजा का पौराणिक इतिहास और कथा

गोवर्धन पूजा की कथा द्वापर युग से जुड़ी है। यह भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की प्रसिद्ध लीलाओं में से एक है, जो हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और अहंकार से दूर रहने की सीख देती है।

इंद्र का अहंकार और ब्रजवासियों की परंपरा

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज के लोग वर्षा के देवता देवराज इंद्र की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि इंद्र देव की कृपा से वर्षा होती है, जिससे खेतों में फसलें उगती हैं और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था होती है।

इसी परंपरा के अनुसार ब्रजवासी हर साल इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए पूजा और यज्ञ का आयोजन करते थे। इस अवसर पर तरह-तरह के पकवान भी तैयार किए जाते थे।

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा का महत्व समझाया

एक दिन बाल गोपाल श्रीकृष्ण ने अपने पिता नंद बाबा और ब्रजवासियों को इंद्र पूजा की तैयारी करते देखा। उन्होंने सहज भाव से पूछा कि वे इंद्र देव की पूजा क्यों करते हैं?

श्रीकृष्ण ने समझाया कि गोवर्धन पर्वत ब्रजवासियों और उनके पशुओं के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां की वनस्पतियां, घास, जलस्रोत और प्राकृतिक संसाधन गायों तथा दूसरे जीवों के लिए उपयोगी हैं। इसलिए हमें अपने जीवन का आधार बनने वाली प्रकृति और गोवर्धन पर्वत के प्रति भी आभार व्यक्त करना चाहिए।

श्रीकृष्ण की बात सुनकर ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय लिया और वहां विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाया।

श्रीकृष्ण ने उठाया गोवर्धन पर्वत

जब देवराज इंद्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने उनकी पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की है, तो वे क्रोधित हो गए। अपने अहंकार में उन्होंने ब्रजभूमि पर मूसलाधार वर्षा करवाने के लिए सांवर्तक मेघों को आदेश दिया।

लगातार तेज बारिश और आंधी के कारण ब्रज के लोग परेशान हो गए। सभी ब्रजवासी भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। तब श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को अपने पशुओं सहित उसके नीचे आश्रय दिया।

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा। अंततः देवराज इंद्र का अहंकार टूट गया। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी।

इसी घटना की स्मृति में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा करने की परंपरा प्रचलित हुई।

3. गोवर्धन पूजा का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व

गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं भी देती है।

अहंकार का त्याग: देवराज इंद्र की कथा हमें सिखाती है कि शक्ति और पद का अहंकार व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जा सकता है। इसलिए जीवन में विनम्रता बनाए रखना जरूरी है।

प्रकृति के प्रति सम्मान: श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा का संदेश हमें प्रकृति, पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और वनस्पतियों का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।

सामूहिक सहयोग की शक्ति: गोवर्धन पर्वत के नीचे सभी ब्रजवासियों को आश्रय मिलने का प्रसंग एकता, विश्वास और सामूहिक सहयोग का प्रतीक माना जाता है।

अन्न का सम्मान: अन्नकूट के माध्यम से हमें भोजन की महत्ता समझने और अन्न की बर्बादी से बचने की प्रेरणा मिलती है।

4. अन्नकूट का महत्व और छप्पन भोग की परंपरा

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Image Credit: Gemini

गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट महोत्सव भी मनाया जाता है। अन्नकूट दो शब्दों से मिलकर बना है—अन्न और कूट। इसका अर्थ है विभिन्न प्रकार के अन्न और व्यंजनों का बड़ा समूह या पहाड़।

इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को अनेक प्रकार के पकवानों का भोग लगाया जाता है। कई मंदिरों में छप्पन भोग की विशेष परंपरा भी निभाई जाती है।

अन्नकूट में आमतौर पर निम्नलिखित व्यंजन शामिल किए जाते हैं:

  • चावल और विभिन्न प्रकार की दालें।
  • कढ़ी, पूरी और खिचड़ी।
  • मौसमी सब्जियां जैसे कद्दू, पालक और मेथी।
  • हलवा, खीर और मिठाइयां।
  • फल, मेवे और अन्य पारंपरिक पकवान।

मथुरा, वृंदावन, नाथद्वारा और देश के अनेक कृष्ण मंदिरों में इस दिन विशेष अन्नकूट की झांकियां सजाई जाती हैं। भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद भक्तों में बांटा जाता है।

छप्पन भोग को लेकर भी एक प्रसिद्ध धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण दिन में आठ बार भोजन करते थे। गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक उठाए रखने के कारण वे भोजन नहीं कर पाए। इस मान्यता के आधार पर सात दिनों के आठ प्रहरों को मिलाकर 56 भोग अर्पित करने की परंपरा जुड़ी हुई है।

अन्नकूट का सबसे सुंदर संदेश है कि भोजन का सम्मान किया जाए और उसे सभी के साथ मिल-बांटकर ग्रहण किया जाए।

5. गोवर्धन पूजा का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व

यदि गोवर्धन पूजा को आधुनिक वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखें, तो इसमें प्रकृति और जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण संदेश मिलता है।

पेड़-पौधों और जैव विविधता का संरक्षण

पहाड़, जंगल और वनस्पतियां पर्यावरण के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अनेक जीव-जंतुओं को आश्रय देते हैं और जलचक्र तथा मिट्टी के संरक्षण में भी योगदान करते हैं। गोवर्धन पर्वत की पूजा हमें प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने की प्रेरणा देती है।

गोधन और जैविक खेती का महत्व

भारतीय कृषि परंपरा में गाय और अन्य पशुधन का विशेष महत्व रहा है। गाय का गोबर उचित तरीके से खाद के रूप में तैयार किया जाए, तो यह मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और उसकी संरचना सुधारने में सहायक हो सकता है। पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक खेती का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गोवर्धन पूजा पर गायों की सेवा और पूजा करके हम पशुओं के प्रति सम्मान तथा उनकी देखभाल का संदेश ग्रहण करते हैं।

अन्न और प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान

अन्नकूट में विभिन्न प्रकार के अनाज, दालें, सब्जियां और मौसमी खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। यह परंपरा हमें भोजन के महत्व को समझने और अन्न की बर्बादी रोकने की सीख देती है।

मौसम और पारंपरिक खानपान

कार्तिक मास में मौसम में बदलाव होने लगता है। इस दौरान कई क्षेत्रों में बाजरा, गुड़, दालें और मौसमी सब्जियों से बने पारंपरिक व्यंजन खाए जाते हैं। स्थानीय मौसम और खानपान की परंपराओं के अनुसार ऐसे भोजन का चयन किया जाता है।

इस प्रकार गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति, पशुधन, भोजन और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संदेश देती है।

6. गोवर्धन पूजा की सरल और संपूर्ण विधि

गोवर्धन पूजा घर पर भी श्रद्धा और सरल तरीके से की जा सकती है। पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।

पहला चरण: गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं

  • सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • घर के आंगन या किसी साफ स्थान पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं।
  • आकृति के आसपास गाय, बछड़े, पेड़-पौधे और ग्वाल-बाल के छोटे प्रतीक बना सकते हैं।
  • भगवान श्रीकृष्ण का चित्र या मूर्ति पास में स्थापित करें।

दूसरा चरण: पूजा सामग्री तैयार करें

गोवर्धन पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री रख सकते हैं:

  • रोली और अक्षत।
  • फूल और फूलों की माला।
  • धूप और दीपक।
  • मौली और चंदन।
  • फल और मिठाइयां।
  • जल से भरा लोटा।
  • घर में बने पकवान और अन्नकूट का भोग।

तीसरा चरण: गोवर्धन जी की पूजा करें

  • सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन जी का ध्यान करें।
  • गोवर्धन पर्वत की आकृति पर रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
  • धूप और दीप जलाकर पूजा करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण को फल, मिठाई और अन्नकूट का भोग लगाएं।
  • परिवार की सुख-समृद्धि और प्रकृति की रक्षा के लिए प्रार्थना करें।

चौथा चरण: गोवर्धन जी की परिक्रमा करें

पूजा के बाद परिवार की परंपरा के अनुसार गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की जाती है। कुछ स्थानों पर सात परिक्रमा करने की परंपरा भी प्रचलित है।

परिक्रमा करते समय भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें और श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करें। यदि आप मथुरा-वृंदावन जाकर वास्तविक गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा नहीं कर सकते, तो घर पर ही प्रतीकात्मक पूजा कर सकते हैं।

पांचवां चरण: गायों की पूजा और सेवा करें

गोवर्धन पूजा के दिन गायों की पूजा का भी विशेष महत्व है।

  • गायों को स्वच्छ पानी और पौष्टिक चारा दें।
  • उनकी सुविधा के अनुसार उन्हें साफ करें और तिलक लगाएं।
  • फूलों की माला पहनाकर श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
  • गुड़ या अन्य उपयुक्त भोजन केवल तभी दें, जब वह पशु के लिए सुरक्षित हो।
  • गायों और अन्य पशुओं की नियमित देखभाल करने का संकल्प लें।

यदि आपके आसपास गाय उपलब्ध नहीं हैं, तो आप गौसेवा से जुड़ी किसी उचित सेवा में सहयोग कर सकते हैं।

7. गोवर्धन पूजा पर ध्यान रखने योग्य बातें

गोवर्धन पूजा करते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  1. पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखें।
  2. गोबर से आकृति बनाते समय स्वच्छता का ध्यान रखें।
  3. भगवान को ताजा और स्वच्छ भोजन का भोग लगाएं।
  4. भोजन और प्रसाद की बर्बादी न करें।
  5. पशुओं को उनकी सेहत के अनुकूल ही भोजन दें।
  6. पूजा की विधि अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अपनाएं।
  7. पूजा के बाद आसपास की सफाई अवश्य करें।

निष्कर्ष: प्रकृति और अन्न के सम्मान का पर्व है गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा केवल एक दिन का धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है। भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला हमें सिखाती है कि अहंकार से दूर रहकर प्रकृति, पशुधन और अपने आसपास के संसाधनों का सम्मान करना चाहिए।

आज के समय में जब पर्यावरण प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जलस्रोतों के संरक्षण जैसी चुनौतियां हमारे सामने हैं, तब गोवर्धन पूजा का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस पर्व पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अन्न की बर्बादी नहीं करेंगे, पेड़-पौधों की रक्षा करेंगे, पशुओं की देखभाल करेंगे और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करेंगे।

प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा जीवन भी सुरक्षित और खुशहाल रहेगा।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई पौराणिक कथा और पूजा विधि धार्मिक मान्यताओं तथा प्रचलित परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि तथा तिथि के पालन में अंतर हो सकता है। पूजा की सही तारीख और मुहूर्त के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।

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